Monday, September 21, 2015

हिंदी भाषा और उसकी लिपि में कोई अंतर नहीं

'हिंदी का महत्व बनाम अंग्रेजी' हमारे समाज की एक स्थायी बहस है। बड़े पैमाने पर देखें तो इसका विस्तार 'कोई भी देसी भाषा बनाम अंग्रेजी' की बहस तक किया जा सकता है, साथ में यह पुछल्ला भी जोड़ा जा सकता है कि किस तरह अंग्रेजी स्थानीय भाषाओं को खत्म करती जा रही है। यह राजनीतिक रूप से संवेदनशील मसला है। हर सरकार खुद को अन्य किसी भी सरकार से ज्यादा हिंदी हितैषी साबित करने पर आमादा है। इसी का नतीजा है कि बीच-बीच में आपको हिंदी उन्नयन अभियानों के दर्शन होते रहते हैं। इसके तहत सरकारी दफ्तर अनिवार्य रूप से अपने सारे सर्कुलर हिंदी में जारी करते हैं और ज्यादातर सरकारी स्कूल हिंदी मीडियम में ही डटे रहते हैं।

इस बीच अंग्रेजी बिना किसी उन्नयन अभियान के ही अभूतपूर्व गति से आगे बढ़ती जा रही है। वजह यह कि अंग्रेजी लोगों को बेहतर करियर की उम्मीद बंधाती है। इससे समाज में उनका रुतबा बढ़ता है। सूचना और मनोरंजन की एक बिल्कुल नई दुनिया उनके सामने खुल जाती है, और टेक्नॉलजी तक पहुंच भी बढ़ती है। हकीकत यही है कि अंग्रेजी की सामान्य जानकारी के बिना आप आज एक मोबाइल फोन या बेसिक मेसेजिंग ऐप्स का भी इस्तेमाल नहीं कर सकते।
हिंदी प्रेमियों का दुख-
बहुत से हिंदी प्रेमी और शुद्धतावादी आज के नए समाज से दुखी हैं, जहां युवा अपनी मातृभाषा को दरकिनार कर जल्द से जल्द अंग्रेजी की दुनिया में जाने को आतुर हैं। लेकिन हिंदी थोपने की जितनी कोशिश वे करते हैं, युवा उससे कहीं ज्यादा विरोध करते हैं। ऐसे में एक हिंदी प्रेमी (इसमें मैं भी शामिल हूं) क्या करे? और बाकी तमाम लोग ऐसा क्या करें कि हिंदी एक बोझ या बाध्यता न लगे? इसका समाधान यह है कि रोमन हिंदी अपनाई जाए। रोमन हिंदी हिंगलिश नहीं है। यह देवनागरी की बजाय ऐंग्लो-सैक्सन लिपि में लिखी हुई हिंदी भाषा है। उदाहरण के लिए 'आप कैसे हैं' को इस तरह लिखा जाए: 'aap kaise hain?'
ऐसा करना जरूरी क्यों है? ऐंग्लो सैक्सन लिपि व्यापक प्रचलन में है। यह कंप्यूटर के कीबोर्ड और मोबाइल की टच स्क्रीन में इस्तेमाल की जाती है। यह काफी लोकप्रिय है, खासकर युवाओं में। आज करोड़ों भारतीय व्हाट्सऐप का प्रयोग करते हैं, जहां तकरीबन सारी बातचीत हिंदी में होती है, लेकिन इसकी लिपि रोमन हुआ करती है। जी हां, देवनागरी लिपि डाउनलोड करने की सुविधा भी है, पर शायद ही कोई उसे प्रयोग में लाता हो। कई देवनागरी कीबोर्ड फोन में लिप्यांतरण करते हैं। यानी आप पहले रोमन में हिंदी टाइप करते हैं, फिर एक सॉफ्टवेयर उसका हिंदी टेक्स्ट तैयार करता है। जाहिर है, यूजर मूल रूप से रोमन हिंदी का ही इस्तेमाल कर रहा है।
रोमन हिंदी बॉलिवुड के पोस्टरों और विज्ञापनों में पहले ही प्रचलित हो चुकी है। ज्यादातर हिंदी फिल्मों के स्क्रीनप्ले रोमन हिंदी में लिखे जा रहे हैं। किसी भी बड़े शहर में घूमने निकलिए, यह मुमकिन नहीं कि रोमन लिपि में लिखे हिंदी कैप्शनों वाली होर्डिंग्स न दिखें। मगर, हिंदी के विद्वान, परंपरावादी और इसे बचाने की मुहिम में लगे लोग या तो इन बातों से अनजान हैं या बिल्कुल उदासीन। वे हिंदी भाषा और उसकी लिपि में कोई अंतर नहीं समझते। लोग आज भी हिंदी से प्यार करते हैं। बस आज की टेक्नॉलजी-आधारित जिंदगी में उस लिपि को शामिल करना उनके लिए मुश्किल हो गया है।
रोमन लिपि को अपनाकर हम हिंदी को बचा सकते हैं। देश की एकता के लिहाज से भी यह बड़ा कदम होगा क्योंकि इससे हिंदी और अंग्रेजी बोलने वाले एक-दूसरे के करीब आएंगे। तय है कि हिंदी के शुद्धतावादी यह सुझाव पसंद नहीं करेंगे। वे हिंदी को बिल्कुल उसी रूप में बनाए रखना चाहते हैं जैसी कि यह थी। मगर, वे भूल जाते हैं कि भाषा वक्त के साथ विकसित होती है। और आज वैश्वीकरण के दौर में अगर हिंदी एक ग्लोबल स्क्रिप्ट अपनाती है तो यह उसके लिए कई तरह से फायदेमंद होगा। इससे दुनिया भर में बहुत सारे लोग हिंदी सीखने को प्रोत्साहित होंगे। कई उर्दू शायर अपनी रचनाएं पारंपरिक उर्दू के बजाय देवनागरी में प्रकाशित कराते रहे हैं। ऐसा वे बड़े स्तर पर अपनी पहुंच बनाने के लिए किया करते हैं। लेकिन यह बीते वक्त की बात हो चुकी है। आज के समय की मांग यह है कि हिंदी को एक नए रूप में अपडेट किया जाए। इसकी शुरुआत हम सरकारी सूचनाओं और सार्वजनिक संकेतों को रोमन हिंदी में लाकर कर सकते हैं, ताकि लोगों में इसकी प्रतिक्रिया देखी जा सके।

किनारे पड़ने का खतरा-

संभावना यह भी है कि रोमन हिंदी प्रिंट मीडिया और किताबों के लिए एक नया उद्योग ही खड़ा कर दे। लाखों लोग इसका इस्तेमाल पहले से करते आ रहे हैं लेकिन अब तक किसी ने इसकी नई संभावनाओं के बारे में सोचा नहीं था। वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य लिपि हिंदी भाषा के लिए भी उम्दा साबित होगी। ऐसा न हुआ तो हिंदी के लिए, अंग्रेजी के हमले के चलते किनारे पड़ जाने का खतरा बना हुआ है। दरअसल, एक भाषा को हमें शुद्धता के नजरिए से नहीं देखना चाहिए। उसे समय के साथ चलना और विकसित होना होगा। waqt ke sath badalna zaroori hai. मतलब आप समझ ही गए होंगे।

Tuesday, September 15, 2015

2020 तक पहली स्वचालित कार सड़कों पर

वैज्ञानिकों का दावा है कि 2020 तक पहली स्वचालित कार सड़कों पर दिखने लगेगी। इसका मतलब यह कि कार चलाते समय चालक को उसे संभालना जरूरी नहीं होगा। उस दौरान वह अपना ईमेल, फोन या कोई अन्य काम कर सकेगा। हालांकि बीच में ऐसा समय भी आ सकता है जब कार का स्वचालित यंत्र चालक को उसे संभालने का संदेश दे, जिसके बाद चालक को मुस्तैद होना पड़ेगा।
बीएमडब्ल्यू की शुरुआत
जर्मनी की बीएमडब्ल्यू में चालक रहित कार के प्रोटोटाइप पर काम चल रहा है। यह गाड़ी भारी ट्रैफिक में खुद ही लेन बदलती है और 120 किमी प्रति घंटा की रफ्तार तक जा पहुंचती है। वैसे सड़क की जटिलताओं के लिए ड्राइवर को भी सक्रिय रहना पड़ता है। यह कार रेडार सेंसरों से लैस है, जो सड़क पर इसकी मदद करते हैं।
प्रोटोटाइप पर काम करने वाले माइकल एबरहर्ड के अनुसार इसकी बड़ी चुनौती रफ्तार को 130 किमी प्रतिघंटा से शून्य पर लाने की है। इसके लिए 80 से 100 मीटर पर ही ब्रेक लगनी शुरू हो जानी चाहिए, जिसका अंदाजा कार का सेंसर लगाएगा। हालांकि इतनी रफ्तार पर सेंसरों के लिए यह चुनौती होगी। खास बात यह है कि चालकरहित कारों के अब तक के परीक्षणों में कोई दुर्घटना नहीं हुई है।
अन्य कंपनियां भी दौड़ में
चालकरहित कारों के निर्माण में मर्सिडीज और गूगल भी दौड़ में हैं। एबरहर्ड के अनुसार हमारी अधिकांश ड्राइविंग नीरस होती है। घर से दफ्तर के बीच कई धक्के पड़ते हैं। इसलिए लोग इस बीच कुछ आराम भी चाहते हैं। उनके अनुसार लगातार बदलते रास्तों से जूझने का काम सेंसर करते हैं। गूगल इस दिशा में खासा सक्रिय है।
गूगल द्वारा जिन विशेषताओं पर काम किया जा रहा है उनमें सड़कों पर चलने वाली दूसरी गाड़ियों का पूर्वानुमान लगाना भी होगा। मसलन, किसी साइकिल सवार का अपनी लेन से भटकना या आगे चल रही गाड़ी का अचानक यू-टर्न लेना।
यही नहीं, खड़ी गाड़ियों में बैठे लोगों द्वारा अचानक दरवाजा खोलने का अंदाजा भी नए सेंसर लगाएंगे। चालकरहित कारों में यह विशेषताएं जोड़ने के लिए गूगल के इंजीनियर प्रयास कर रहे हैं। गूगल की "बबल कार" का ऐसी ही अजीबोगरीब परिस्थितियों में परीक्षण किया जाता है।
विशेषज्ञों के विचार
गूगल के सह-संस्थापक सर्जेइ ब्रिन के अनुसार वह इन तकनीकों की मदद से बड़ा बदलाव लाना चाहते हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर इसे अमल में लाने में समय लगेगा। बीएमडब्ल्यू, टोयोटा, मर्सिडीज और वोल्वो के विशेषज्ञ भी यह भलीभांति जानते हैं। गूगल की सोच है कि ड्राइविंग में गलतियां करने वाले लोगों को उससे छुटकारा मिलना चाहिए, जिसके लिए बड़े परिवर्तन ही सफल होंगे।
गूगल के अनुसार अन्य चीजों की तरह अब कारों को भी डाटा आधारित होना चाहिए। गूगल ने विशेषज्ञों की बजाय अपने कर्मचारियों को चालकरहित कारों के परीक्षण में इस्तेमाल किया है, जिसके सकारात्मक नतीजे निकले। फिर भी चालकरहित कारों की तकनीक पर आंखें मूंद कर यकीन करने पर गूगल आगाह करता है।
आगे की बात
चालकरहित कारों के विशेषज्ञ अब इसके तकनीकी पक्ष की बजाय, बिक्री के पक्ष पर सोचने लगे हैं। एबरहर्ड के अनुसार ऑटोमोबाइल उद्योग के हर परिवर्तन को कुछ झिझक के बाद ही सही, पर अपना लिया जाता है। तो क्या ऐसे वाहनों में दुर्घटना होने पर जिम्मेदारी क्या चालक की होगी ? एबरहर्ड के अनुसार अब वह दिन भी दूर नहीं जब कारों में भी हवाई जहाजों की तरह ब्लैक बॉक्स होगा, जिसके डाटा से सब पता चलेगा।

एबरहर्ड के अनुसार, वह सिर्फ इतनी ही उम्मीद करते हैं कि स्वचालित गाड़ियों में चालक इतना मसरूफ कभी न हो कि चलती गाड़ी से उसका ध्यान ही हट जाए।

Monday, September 7, 2015

दिल्‍ली की सड़कों के मौजूदा और पुराने नामों की जानकारी

देश के पूर्व राष्‍ट्रपति दिवंगत डॉ. एपीजे अब्‍दुल कलाम के सम्‍मान में देश की राजधानी दिल्‍ली की एक सड़क का नाम बदल दिया गया है।
डॉ. कलाम के देहांत के बाद औरंगजेब रोड का नाम बदलकर डॉ. एपीजे अब्‍दुल कलाम रोड रख दिया गया है। इस परिवर्तन को लेकर थोड़ी राजनीति भी हुई थी।
लेकिन पूर्वी दिल्‍ली से भाजपा सांसद महेश गिरी की मांग को लागू कर दिया गया है। गौरतलब है कि एक जमाने में इसी क्षेत्र में पाकिस्‍तान के संस्‍थापक मुहम्‍मद अली जिन्‍ना का घर भी था।
औरंगजेब रोड पहली ऐसी सड़क नहीं है, जिसका नाम बदला गया है। दिल्‍ली में ऐसी सड़कों की काफी लंबी लिस्‍ट है, जिनका नाम बदला जा चुका है।
आइए, आपको दिल्‍ली की ऐसी ही सड़कों के मौजूदा और पुराने नामों की जानकारी देते हैं:
मध्‍य दिल्‍ली
डॉ. बिशंभर दास मार्ग
पुराना नाम : एलेन्‍बी रोड
प्रथम विश्‍व युद्ध के दौरान ब्रिटिश फील्‍ड मार्शल रहे एडमंड एलेन्‍बी के नाम पर इस सड़क का नाम रखा गया था। लेकिन आजादी इस सड़क का नाम पंजाब के होम्‍योपैथ डॉक्‍टर बिशंभर दास के नाम पर कर दिया गया है। डॉ. दास ने होम्‍योपैथी को पूरे देश में पहुंचाया था।
तीन जनवरी मार्ग
पुराना नाम : अल्‍बुकर्क रोड
राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी की हत्‍या इसी बंगले के परिसर में हुई थी। हत्‍या की तारीख के नाम पर इस सड़क का नामकरण किया गया था। पूर्व में इस सड़क का नाम गोवा में पुर्तगाली गवर्नर अफोन्‍सो दे अल्‍बुकर्क के नाम पर था।
बंगला साहिब मार्ग
पुराना नाम : बायर्ड रोड
मैसूर के शासक टीपू सुलतान को श्रीरंगपटनम की लड़ाई (4 मई 1799) में हराने के बाद जनरल डेविड बायर्ड ने ही उनका शव खोजा था। उनके नाम पर अंग्रेजों ने दिल्‍ली में एक सड़क का नाम रखा था। लेकिन विख्‍यात गुरुद्वारे की वजह से इसका नाम बदल दिया गया।
सुब्रमण्‍य भारती मार्ग
पुराना नाम : कॉर्नवालिस रोड
खान मार्केट के सामने की इस सड़क का नाम ब्रिटिश गवर्नर जनरल के नाम पर था। आजादी के इस इस सड़क का नाम 20वीं शताब्‍दी के सुविख्‍यात तमिल कवि के नाम पर रख दिया गया।
राजाजी मार्ग
पुराना नाम : किंग जॉर्ज एवेन्‍यू
ब्रिटिश शासक को खुश करने के लिए अंग्रेजों ने इस सड़क का नाम किंग जॉर्ज एवेन्‍यू रख दिया था। जिसे बाद में भारत के अंतिम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के नाम पर राजाजी मार्ग कर दिया गया था।
अमृता शेरगिल मार्ग
पुराना नाम : रेटेन्‍डन रोड
लोधी गार्डन (पुराना नाम : लेडी विलिंग्‍डन पार्क) के बगल की इस सड़क का नाम लेडी विलिंग्‍डन के बेटे रेटेन्‍डन के नाम पर रखा गया था। बाद में इस सड़क का नाम अमृता शेरगिल मार्ग कर दिया गया था।
जवाहर लाल नेहरू मार्ग
पुराना नाम : सर्कुलर रोड
नई दिल्‍ली के कनॉट प्‍लेस और पुरानी दिल्‍ली के तुर्कमान गेट के पास की इस सड़क का नाम देश के पहले प्रधानमंत्री के नाम पर रखा गया है। रामलीला मैदान भी इसी के पास है।
त्‍यागराज मार्ग
पुराना नाम : क्‍लाइव रोड
बंगाल के प्रशासक रॉबर्ट क्‍लाइव के नाम पर इस सड़क को नाम दिया गया था। बाद में इसे 18वीं शती के ख्‍यात संगीतज्ञ त्‍यागराज के नाम कर दिया गया।
बलवंत राय मेहता लेन
पुराना नाम : कर्जन लेन
गुजरात के दूसरे मुख्‍यमंत्री के नाम पर इस सड़क का मौजूदा नाम रखा गया है। इससे पहले बंगाल विभाजन के जिम्‍मेदार ब्रिटिश वायसरॉय के नाम से इसे जाना जाता था।
कस्‍तूरबा गांधी मार्ग
पुराना नाम : कर्जन रोड
इस सड़क पर ब्रिटिश काउंसिल, अमेरिकन सेंटर और मैक्‍समूलर भवन हैं। अब इसे महात्‍मा गांधी की पत्‍नी के नाम से जाना जाता है।
बहादुरशाह जफर मार्ग
पुराना नाम : मथुरा रोड
आखिरी मुगल सम्राट के नाम से इस सड़क को जाना जाता है। जफर को उनके ही बेटे ने राज्‍य से निर्वासित कर दिया था। इस रोड पर देश के नामी अखबारों के दफ्तर हैं1
तिलक मार्ग
पुराना नाम : हार्डिंग एवेन्‍यू
आजादी के बाद देश के पहले कानून मंत्री और दलित नेता बीआर अंबेडकर यहां रहा करते थे। हालांकि सड़क का नाम स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी बाल गंगाधर तिलक के नाम पर रखा गया है।
काली बाड़ी मार्ग
पुराना नाम : हैवलॉक रोड
इस सड़क को ब्रिटिश जनरल हेनरी हैवलॉक का नाम दिया गया था। हैवलॉक ने 1857 के विद्रोह के बाद कानपुर को दोबारा ब्रिटिश शासन के अधीन किया था। 1930 में इस क्षेत्र में काली माता का मंदिर बनाया गया था, और उसी आधार पर मौजूदा नाम दिया गया है।
बाबा खड़गसिंह मार्ग
पुराना नाम : इरविन रोड
इरविन ब्रिटिश अधिकारी और वायसरॉय थे, वहीं खड़गसिंह, आजादी के सिपाही थे। इसी रोड पर स्‍टेट एम्‍पोरियम्‍स और हनुमान मंदिर भी है।
टॉलस्‍टॉय मार्ग
पुराना नाम : कीलिंग रोड
मौलाना आजाद रोड
पुराना नाम : किंग एडवर्ड रोड
राजपथ
पुराना नाम : किंग्‍स वे
सरदार पटेल मार्ग
पुराना नाम : किचेनर रोड
विवेकानंद मार्ग
पुराना नाम : मिंटो रोड
रफी मार्ग
पुराना नाम : ओल्‍ड मिल रोड
जनपथ
पुराना नाम : क्‍वींस वे
श्रीमंत माधवराव सिंधिया मार्ग
पुराना नाम : कैनिंग रोड
मंदिर मार्ग
पुराना नाम : रीडिंग रोड
तीन मूर्ति मार्ग
पुराना नाम : रॉबर्ट्स रोड
उत्‍तरी दिल्‍ली
शामनाथ मार्ग
पुराना नाम : अलीपुर रोड
रानी झांसी रोड
पुराना नाम : म्‍यूटिनी मेमोरियल रोड
विश्‍वविद्यालय मार्ग
पुराना नाम : सर्किट हाउस रोड
राजनिवास मार्ग
पुराना नाम : लड्लो कैसल रोड
पुरानी दिल्‍ली
अंसारी रोड
पुराना नाम : दरियागंज रोड
नेताजी सुभाष मार्ग
पुराना नाम : एल्गिन रोड
स्‍वामी श्रद्धानंद मार्ग
पुराना नाम : गार्सटिन बैसन रोड
जानी-पहचानी सड़कें
वो सड़कें जिनका नाम नहीं बदला गया है और आज भी पुराने नाम ही यहां की पहचान बने हुए हैं:
·         कनॉट लेन
·         रेस कोर्स रोड
·         डलहौजी रोड
·         चेम्‍सफोर्ड रोड

·         लोधी रोड

Friday, September 4, 2015

हार्दिक शुभकामनायें

हमारे सभी पाठकों को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें 

Tuesday, September 1, 2015

जहां पानी की चोरी होती है

चोर कुछ भी चुरा सकता है। लेकिन क्‍या पानी चुराने के लिए किसी घर में कभी चोरी हो सकती है। शायद नहीं। लेकिन महाराष्‍ट्र में एक ऐसा शहर है, जहां पानी की चोरी होती है। लातून जिले में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां लोग पीने के पानी की चोरी करते हैं। दरअसल इस शहर में पानी की घोर किल्‍लत है।

ऐसे में जिनके घरों में पानी रहता है, वो इसे ताले के पीछे सुरक्षित रखते हैं। क्‍योंकि ऐसे घर बाल्‍टीधारी चोरों के निशाने पर होते हैं। ये चोर बाल्‍टी लेकर घरों में चुपके से घुसते हैं और पानी चुराकर भाग जाते हैं। महाराष्‍ट्र के मराठवाड़ा और लातूर जिले में पानी की घोर किल्‍लत है। यही वजह है कि यहां सोने-चांदी से भी ज्‍यादा कीमती चीज अगर कोई है, तो वो हैं पानी।