Monday, April 1, 2013

मुंबई की धारावी भारत की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी है और एक आकलन के मुताबिक यहां 65 करोड़ डॉलर का कारोबार होता है।

जनगणना आयोग की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में छह करोड़ 40 लाख लोग, यानी हर छह में एक भारतीय गंदी-संदी झोपड़पट्टियों में रहते हैं, जो इंसानों के रहने लायक नहीं हैं। इस तथ्य को लेकर कई तरफ से आहें-कराहें सुनाई पड़ रही हैं। लेकिन ज्यादातर गांवों में स्थितियां इससे भी बुरी हैं। जानवर पालकर मजे से रह लेने की खुशफहमी वाले लोगों की कल्पना में हरे-भरे गांव शहरी मलिन बस्तियों की तुलना में कहीं अच्छे हैं। लेकिन दसियों लाख लोगों का हर साल गांवों से भागकर इन्हीं गंदी बस्तियों में रहना यह बताता है कि लोग इन्हें आगे बढ़ने के रास्ते की तरह देखते हैं। झोपड़पट्टियां गंदी जरूर हैं लेकिन ये उद्यमशीलता का गढ़ भी हैं। भारत का निर्धन वर्ग इन्हें अवसर और आय की सीढ़ियों की तरह देखता है। इस जनगणना रिपोर्ट में ही यह बताया गया है कि झोपड़पट्टियों के 16.7 प्रतिशत घर असलियत में कारखाना, दुकान या दफ्तर हैं। ये बंद गली जैसी कोई चीज नहीं, चहल-पहल भरे वाणिज्यिक केंद्र हैं।

मुंबई की धारावी भारत की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी है और एक आकलन के मुताबिक यहां 65 करोड़ डॉलर का कारोबार होता है। न जाने कितने 'स्लमडॉग मिलियनेयर' यह अब तक तैयार कर चुकी है। ऐसी जगहें ईर्ष्या का विषय बननी चाहिए, दया का नहीं। चंद्रभान प्रसाद और मिलिंद कांबले जैसे दलित लेखकों ने इस बात को रेखांकित किया है कि शहर कैसे अवसर और गरिमा का केंद्र हैं। आंबेडकर ने क्रूरता और पूर्वाग्रह के अंधकूप के रूप में गांवों की भर्त्सना की है, जो बिल्कुल ठीक है। कई ग्रामीण इलाकों में ताकतवर जातियां आज भी सामंती शासकों जैसा बर्ताव करती हैं। कई गांवों में सामाजिक बाधाएं दलितों और शूद्रों के लिए सिर उठाकर चलना मुश्किल बना देती हैं। लेकिन एक बार शहर चले जाने के बाद वे जाति आधारित ऊंच-नीच और भूस्वामी पर निर्भरता के चंगुल से छूट जाते हैं। गांवों की तुलना में शहरों में उनकी आमदनी कहीं ज्यादा होती है, और यहां से जो पैसे कमाकर वे अपने घर भेजते हैं, उनके सहारे उनके संबंधी भी गांवों के सामंती माहौल से आजादी हासिल करते हैं।


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