Thursday, April 18, 2013

जुलाई 2010 की अधिसूचना रद्द


 इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश में छत्रपति शाहूजी महाराज नगर (अमेठी) नामक नया जिला बनाने संबंधी पूर्ववर्ती मायावती सरकार की जुलाई 2010 की अधिसूचना सोमवार को रद्द कर दी।

मुख्य न्यायाधीश शिवकीर्ति सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोरा की खंडपीठ ने इस मामले में लंबित याचिकाओं पर यह फैसला दिया। ये याचिकाएं बृजकिशोर वर्मा तथा अन्य ने दायर की थीं।

मायावती सरकार ने सुलतानपुर जिले की अमेठी, गौरीगंज और जगदीशपुर तीन तहसीलों और रायबरेली जिले की सलोन और तिलोई तहसीलों को काटकर छत्रपति शाहूजी महाराज नगर नामक नया जिला बनाने की अधिसूचना एक जुलाई 2010 को जारी की थी। इसके खिलाफ बृजकिशोर वर्मा तथा अन्य ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ में याचिकाएं दायर की थी।

Monday, April 15, 2013

दो दर्जन अधिकारियों के एक दल ने उनके घर पर आकर लाल बत्ती उतारी


 समाजवादी पार्टी की सांसद जया प्रदा ने आज कहा कि कुछ सरकारी अधिकारियों ने उनकी गाड़ी से जबर्दस्ती लाल बत्ती हटा दी। सांसद ने मामले को संसद में उठाने की चेतावनी दी। उन्होंने दावा किया कि पुलिसकर्मियों सहित करीब दो दर्जन अधिकारियों के एक दल ने उनके घर पर आकर लाल बत्ती उतारी।

अभिनेत्री से नेत्री बनीं जया प्रदा ने कहा, ''अधिकारियों को मेरे घर नहीं आना चाहिए था। उन्हें मेरी गाड़ी की जांच सड़क पर करनी चाहिए थी।'' उन्होंने कहा, ''मैं मामले को संसद में उठाऊंगी।'' इसी जिले में जया प्रदा के होटल कक्ष में तीन मार्च को पुलिस की छापेमारी के बाद यह कार्रवाई हुई है।

पुलिस ने कहा था कि छापेमारी इस संदेह पर की गई कि पूर्व अभिनेत्री मतदाताओं के बीच बांटने के लिए काफी मात्रा में धन लेकर आई हैं। जया प्रदा भले ही एसपी की सांसद हैं लेकिन वह अमर सिंह से जुड़ी हुई हैं जिन्हें पार्टी ने निष्कासित कर दिया था।

Thursday, April 4, 2013

समस्याएं जटिल हैं और इसके जवाब भी जटिल हैं


उद्योग संगठन सीआईआई के सालाना सम्मेलन में कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भारतीय शासन व्यवस्था में भारी बदलाव की पैरवी की। उन्होंने कहा कि समस्याएं जटिल हैं और इसके जवाब भी जटिल हैं। कोई भी एक आदमी एक अरब लोगों की समस्याएं दूर नहीं कर सकता है, एक अरब लोगों को पावर दीजिए समस्याएं खुद-ब-खुद दूर हो जाएंगी। हालांक, ये बदलाव कैसे आएंगे, इसका कोई ठोस उपाय राहुल नहीं सुझा पाए।

अपने भाषण के दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष ने परोक्ष रूप से बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि यूपीए के शासनकाल में सबको साथ लेकर चलने की कोशिश हुई इसलिए प्रगति हुई। उन्होंने कहा कि अलगाव की राजनीति बंद होनी चाहिए।राहुल गांधी ने कहा कि मैं प्रधानमंत्री बनूंगा या नहीं, मैं शादी करूंगा या नहीं, ये सब अप्रासंगिक और गैरजरूरी सवाल हैं।

पहली बार कॉरपोरेट जगत से मुखातिब राहुल ने कहा कि 4000 हजार विधायक और 600-700 सांसद मिलकर देश को चला रहे हैं। इन करीब 5000 लोगों को 200-300 लोग चुनते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था सांसदों और विधायकों के लिए बनी है। हमें गांवों को साथ लेना होगा।

Monday, April 1, 2013

मुंबई की धारावी भारत की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी है और एक आकलन के मुताबिक यहां 65 करोड़ डॉलर का कारोबार होता है।

जनगणना आयोग की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में छह करोड़ 40 लाख लोग, यानी हर छह में एक भारतीय गंदी-संदी झोपड़पट्टियों में रहते हैं, जो इंसानों के रहने लायक नहीं हैं। इस तथ्य को लेकर कई तरफ से आहें-कराहें सुनाई पड़ रही हैं। लेकिन ज्यादातर गांवों में स्थितियां इससे भी बुरी हैं। जानवर पालकर मजे से रह लेने की खुशफहमी वाले लोगों की कल्पना में हरे-भरे गांव शहरी मलिन बस्तियों की तुलना में कहीं अच्छे हैं। लेकिन दसियों लाख लोगों का हर साल गांवों से भागकर इन्हीं गंदी बस्तियों में रहना यह बताता है कि लोग इन्हें आगे बढ़ने के रास्ते की तरह देखते हैं। झोपड़पट्टियां गंदी जरूर हैं लेकिन ये उद्यमशीलता का गढ़ भी हैं। भारत का निर्धन वर्ग इन्हें अवसर और आय की सीढ़ियों की तरह देखता है। इस जनगणना रिपोर्ट में ही यह बताया गया है कि झोपड़पट्टियों के 16.7 प्रतिशत घर असलियत में कारखाना, दुकान या दफ्तर हैं। ये बंद गली जैसी कोई चीज नहीं, चहल-पहल भरे वाणिज्यिक केंद्र हैं।

मुंबई की धारावी भारत की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी है और एक आकलन के मुताबिक यहां 65 करोड़ डॉलर का कारोबार होता है। न जाने कितने 'स्लमडॉग मिलियनेयर' यह अब तक तैयार कर चुकी है। ऐसी जगहें ईर्ष्या का विषय बननी चाहिए, दया का नहीं। चंद्रभान प्रसाद और मिलिंद कांबले जैसे दलित लेखकों ने इस बात को रेखांकित किया है कि शहर कैसे अवसर और गरिमा का केंद्र हैं। आंबेडकर ने क्रूरता और पूर्वाग्रह के अंधकूप के रूप में गांवों की भर्त्सना की है, जो बिल्कुल ठीक है। कई ग्रामीण इलाकों में ताकतवर जातियां आज भी सामंती शासकों जैसा बर्ताव करती हैं। कई गांवों में सामाजिक बाधाएं दलितों और शूद्रों के लिए सिर उठाकर चलना मुश्किल बना देती हैं। लेकिन एक बार शहर चले जाने के बाद वे जाति आधारित ऊंच-नीच और भूस्वामी पर निर्भरता के चंगुल से छूट जाते हैं। गांवों की तुलना में शहरों में उनकी आमदनी कहीं ज्यादा होती है, और यहां से जो पैसे कमाकर वे अपने घर भेजते हैं, उनके सहारे उनके संबंधी भी गांवों के सामंती माहौल से आजादी हासिल करते हैं।