Tuesday, September 22, 2009

एमआरवीसी का नाम बढे उससे अधिक काम बढे

देश के कोने कोने में रेल हमारी जाती है
हिंदी भाषा ही जिसको सारे मार्ग दिखाती है ।


यात्री अपने प्रांत के एक दूजे से मिल जाते हैं
यात्रा के दौरान वे सब हिंदी के गुन गाते है ।


मद्रासी हो गुजराती हो यात्री चाहे हो सिंधी
मेल मिलाप की बात चले जब, सबकी भाषा हो हिंदी ।


रेल मिलाती है शहरों को गांवों से देहातो से
तुम भी अपने दिल मिलाओं हिंदी छलके बातों से ।


एक ही भाषा है जो सारे भाषाओं की रानी है
हिंदी में ही काम चले जब सामने हिंदुस्तानी है ।


विकास पथ के पथ पर चलके रेल विकास करना है
तकनीकों का स्वागत करके तकलीफों का नीकास करना है ।


एमआरवीसी का नाम बढे उससे अधिक काम बढे
यात्री जिससे हो संतुष्ट ऐसे प्रयास करना है ।

कलीमुल्ला अ. अजी़म
एमआरवीसी