इसरो ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से देश के अब तक के सबसे भारी
रॉकेट जीएसएलवी मार्क-III के सफल प्रक्षेपण के साथ अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में
सफलता की एक और छलांग लगा दी है। स्पेस सेंटर से सुबह करीब साढ़े नौ बजे लॉन्च किए
इस रॉकेट की लंबाई 42.4 मीटर है और इस पर कुल लागत 155 करोड़ की आई है। नई जेनरेशन
के 630 टन के इस रॉकेट के प्रक्षेपण के सफल रहने की घोषणा करते हुए
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चेयरमैन के राधाकृष्णन ने कहा कि मार्क-III टेस्ट फ्लाइट मिशन कामयाब रहा
है।
इसके सफल परीक्षण के साथ ही अब भारत उन देशों की लिस्ट में
शामिल हो गया है, जो अंतरिक्ष में बड़े सैटलाइट भेजने की काबिलियत रखते हैं। जीएसएलवी मार्क-III रॉकेट के साथ इंसान को
अंतरिक्ष में ले जाने वाले यान ( क्रू मॉड्यूल) का भी सफल परीक्षण किया गया। यह
यान दो से तीन लोगों को अंतरिक्ष में ले जा सकता है। यान 125 किलोमीटर की ऊंचाई तक गया और
उसके बाद फिर पैराशूट के सहारे बंगाल की खाड़ी में अंडमान-निकोबार में एक द्वीप पर
लैंड करने में सफल रहा।
जीएसएलवी मार्क-III की परिकल्पना और उसकी डिजाइन इसरो को इनसैट- 4 श्रेणी के 4,500 से 5,000 किलोग्राम वजनी भारी कम्युनिकेशन सैटलाइट्स को लॉन्च करने की दिशा में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाएगा। इसके दो फायदे होंगे जहां भारी सैटलाइट्स भेजने के मामले में हम आत्मनिर्भर हो जाएंगे, वहीं अरबों डॉलर के कमर्शल लॉन्चिंग मार्केट में भारत की क्षमता में इजाफा होगा। क्रू मॉड्यूल की टेस्टिंग की सफलता से भारत इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की दिशा में आगे बढ़ गया है। अभी तक रूस, अमेरिका और चीन के पास इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की काबिलियत है।
जीएसएलवी मार्क-III की लॉन्चिंग का वक्त 'मिशन रेडीनेस रिव्यू ऐंड लॉन्च ऑथराइजेशन बोर्ड' की मीटिंग में तय किया गया। इसरो के एक सीनियर ऑफिसर ने बताया कि इसके लिए काउंटडाउन की कम अवधि 'डमी क्रायोजेनिक स्टेज' की वजह से है। इसरो ने बताया कि रॉकेट पर 140 करोड़ रुपये का खर्च और क्रू मॉड्यूल पर 15 करोड़ रुपये का खर्च आया है।श्रीहरिकोटा से उड़ान भरने के तुरंत बाद इसरो एलवीएम-3 के पैराशूट के संचालन, एयरो ब्रेकिंग सिस्टम वगैरह के साथ क्रू मॉड्यूल के पृथ्वी के परिमंडल में फिर से प्रवेश करने की क्षमता का भी टेस्ट किया। समुद्र से 126.16 किमी की उंचाई से उड़ान के बाद क्रू मॉड्यूल रॉकेट से करीब 325.52 सेकंड में अलग हुआ। विशेष तरह से निर्मित पैराशूट मॉड्यूल ने अंडमान-निकोबार द्वीप में इंदिरा गांधी पॉइंट से करीब सौ किलोमीटर की दूरी पर बंगाल की खाड़ी में 'आसानी से गिरने' में मदद किया।
जीएसएलवी मार्क-III की परिकल्पना और उसकी डिजाइन इसरो को इनसैट- 4 श्रेणी के 4,500 से 5,000 किलोग्राम वजनी भारी कम्युनिकेशन सैटलाइट्स को लॉन्च करने की दिशा में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाएगा। इसके दो फायदे होंगे जहां भारी सैटलाइट्स भेजने के मामले में हम आत्मनिर्भर हो जाएंगे, वहीं अरबों डॉलर के कमर्शल लॉन्चिंग मार्केट में भारत की क्षमता में इजाफा होगा। क्रू मॉड्यूल की टेस्टिंग की सफलता से भारत इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की दिशा में आगे बढ़ गया है। अभी तक रूस, अमेरिका और चीन के पास इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की काबिलियत है।
जीएसएलवी मार्क-III की लॉन्चिंग का वक्त 'मिशन रेडीनेस रिव्यू ऐंड लॉन्च ऑथराइजेशन बोर्ड' की मीटिंग में तय किया गया। इसरो के एक सीनियर ऑफिसर ने बताया कि इसके लिए काउंटडाउन की कम अवधि 'डमी क्रायोजेनिक स्टेज' की वजह से है। इसरो ने बताया कि रॉकेट पर 140 करोड़ रुपये का खर्च और क्रू मॉड्यूल पर 15 करोड़ रुपये का खर्च आया है।श्रीहरिकोटा से उड़ान भरने के तुरंत बाद इसरो एलवीएम-3 के पैराशूट के संचालन, एयरो ब्रेकिंग सिस्टम वगैरह के साथ क्रू मॉड्यूल के पृथ्वी के परिमंडल में फिर से प्रवेश करने की क्षमता का भी टेस्ट किया। समुद्र से 126.16 किमी की उंचाई से उड़ान के बाद क्रू मॉड्यूल रॉकेट से करीब 325.52 सेकंड में अलग हुआ। विशेष तरह से निर्मित पैराशूट मॉड्यूल ने अंडमान-निकोबार द्वीप में इंदिरा गांधी पॉइंट से करीब सौ किलोमीटर की दूरी पर बंगाल की खाड़ी में 'आसानी से गिरने' में मदद किया।